4.5.16

कविता हो मेरी

झिलमिल टिमटिम करती रहना
कविता हो मेरी सजती रहना
इंशा तुम सच में सबसे जुदा हो
इस झूठ का सच किसी से न कहना 


शहर को ये गुमाँ है
कि वो गांवों से महान है
सब जान के अनजान हैं
खिड़कियाँ बंद हैं तो आराम है

तू खिड़की खोल के टोकती रहना
कविता हो मेरी सजती रहना

सूरज भी चाँद से कितना ख़फ़ा है
धूप है बूढ़ी चांदनी क्यूँ जवां है
सच है भद्दा दाग़ लगा है
उल्टा तवा तू घिसती क्या है

उम्मीद की रोटी सेंकती रहना
कविता हो मेरी सजती रहना 

तीन अंतरे और एक मुखड़ा है
अंतरे में अंतरमन छुप्पा है
मुखड़ा शायद ही याद है
इन्हें सिर्फ़ देह की आस है 

तू इनको आस-पास न अपने सहना
कविता हो मेरी सजती रहना


इंशा तुम सच में सबसे जुदा हो 
इस झूठ का सच किसी से न कहना 
झिलमिल टिमटिम करती रहना
कविता हो मेरी सजती रहना...






No comments: