10.5.16

भोर


नशा बाहों में सिमट जाने को है

नींद भी एक करवट गुज़र जाने को है

शिकायत सिर्फ़ एक को थी और वो था चाँद

अब उसकी भी ज़िद्द मर जाने को है

खड़ा है उस पल की आँखों में आँखें गड़ाए

जो पल उसकी हस्ती मिटाने को है

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