11.9.14

औक़ात


एक ग़ज़ल की दरख़ास्त दबी है 

दूर... यादों के मलबे में 

अमां छोडो यार,

किशमिश की भला क्या औक़ात है 

मूंग की दाल के हलवे में

मुनासिब नहीं


इंतज़ार का इज़हार मुनासिब नहीं 

वक़्त फिर पैमाइश है 
मुंसिफ नहीं

15 अगस्त 2014


सूरज को जलता और
हवाओं को नर्म पाया 
अख़बार में शहीदों को 
नेताओं की फोटो से 
जूझता पाया

3.9.14

होनहार और सियार

होता है इम्तिहान में 
ऐसा कई बार 
टीप लेता है डरपोक 
रह जाता है होनहार 

होनहार करे तो क्या करे 
करता है सोच-विचार 
प्रधान से भी क्या कहे 
एक तो होनहार ऊपर से वफ़ादार 

होनहार के पास सिर्फ़ 
एक था उपचार 
गोली मारो बीते कल को 
आगे बढ़ो यार 

भाड़ में गयी वफ़ादारी 
भाड़ में गया प्यार 
लालच नफ़रत और ज़िद्द से 
अब होगा क़ारोबार 

डरपोक चौड़ा हो के घूमे 
जैसे कोई थानेदार 
डील-डौल और सोच-विचार से 
सौ प्रतिछत सियार 

वक़्त बीता मौसम गुज़रे 
फ़िर आया इम्तिहान का त्यौहार 
होनहार को था 
डरपोक का इंतज़ार 

कैसा होगा मुक़ाबला 
क्या होगा इस बार 
सारी उत्सुकता धरी रह गयी 
नज़र न आया सियार 

हार पेहन के बिगुल बजाते 
घर पहुंचा होनहार 
माँ से जाके पूँछ ही बैठा 
कहाँ गया सियार?

सियार यहीं है बोली माँ 
तेरा बदल गया संसार 
लालच नफ़रत और ज़िद्द का 
तू ने जब से किया विचार 

अचरज से जब पलट के देखा 
सामने खड़ा था सियार 
क्रोध में दर्पण तोड़ दिया 
सहस्त्र हो गए सियार   

2.9.14

कुछ मर चुका है


ख़ुश तो मैं बहुत हूँ 
मग़र  
कुछ मर चुका है 


बाहों में मेहबूब है मग़र  
यकीं मर चुका है 

सांसों में ख़ुश्बू है मग़र 
एहसास मर चुका है 

आँखों में जुनून है मग़र 
फ़ितूर मर चुका है 

हाथों में जाम है मग़र 
सुरूर मर चुका है 

जेब में गरमी है मग़र 
गुरूर मर चूका है 


आज, 
ख़ुश तो मैं बहुत हूँ 
मग़र  
कुछ मर चुका है