19.3.14

दो-ढाई अपने


चेहरे मिलते हैं जैसे नींदों में सपने 
स्टेशन पे गले लगते हैं कुल दो-ढाई अपने

काल


काल के घर जाना है पर सुना, दूर बहुत है 
झूठ है अदना सा पर मशहूर बहुत है

भूल


किताब वही महंगी है बाज़ार में 
जिसपे चढी हो समय की धूल 

माँ का क्या है लाड़ ही करेगी 
कर ले तेरे हिस्से कि भूल 

तमस, रस्क और सत् में चुन्न ले 
शैली जो तबियत करे कबूल

मय से हमेशा दूर ही रखना 
अक्षत, मोती, फूल और उसूल

शिकायत


आँखों को दिल से 
शिकायत नहीं होती

गर धड़कनों के शोर से
नींद गायब नहीं होती 

दिल भी बेचारा क्या करे.…
गर उल्फ़त सोने नहीं देती
और नफरत
जागने नहीं देती